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तिलाठी

तिलाठी

मिथिलाक प्राण गाम मे बसैत अछि। तप:भूमि मिथिला के गाम सभ समग्र रूप सॅं एतए के व्यवहार, संस्कृति, रहन-सहन, भाषा- बोली, शिक्षा आ सम्पन्नता के ऐतिहासिक धरोहर थीक। ई गाम सभ पृथक रूप सॅं सेहो अपन-अपन विशिष्ट मौलिक पहचान सॅं प्रसिद्ध अछि। विदेह भूमि के एहि अमूल्य भंडार मे नेपाल के सप्तरी जिलाक पर्वतमाला के कोरा मे बसल, कोशीक कछेर पर अवस्थित अछि एकटा ऐतिहासिक गाम – तिलाठी  ।

 

एहि गाम पहुंचबाक हेतु सभ सॅं नजदीक के रेलवे स्टेशन थीक निर्मली। निर्मली सॅं राष्ट्रीय राजमार्ग 57 पर अवस्थित भूतहा होइत 35 कि. मी. उत्तर कुणौली बाजार सड़क मार्ग सॅं यात्रा करए पड़ैत अछि। एतए नेपाल भारत के अन्तर्राष्ट्रीय सीमा छै जकरा बिना कोनो रोकटोक पार कऽ सकैत छी। कुणौली बाजार सॅं डेढ़ कि. मी. उत्तर पश्चिम के दिशा मे अवस्थित अछि सुन्दर सुरम्य गाम तिलाठी। कुणौली बाॅर्डर सॅं पद यात्रा कऽ केॅ 15 सॅं 20 मीनट मे पहुंच सकैत छी, ओना अटो रिक्सा, टेम्पू आदि प्रशस्त मात्रा मे भेटैत छैक। नेपाल के भू-भाग सॅं एतए पहुंचबाक लेल राजविराज पहुंचि 8 कि. मी. दक्षिण दिशा के यात्रा करए पड़ैत अछि, जाहि लेल बस, कार, टेम्पू, अटो रिक्सा आदि साधन सदिखन प्रशस्त रूप सॅं भेटैत छै।

 

एहि गाम केॅ तीन दिशा सॅं तीन टा नदी आवेष्टित कयने अछि। जनश्रुति अनुसार त्रि नदी वेष्टित एहि पवित्र भूमि पर सर्वप्रथम त्रिदण्डी मुनि अपन आश्रम बनाओने छलाह। हुनकहिं नाम सॅं परिचित ई स्थान कालांतर मे लोक भाषाक प्रभाव सॅं तिलाठी नाम सॅं प्रसिद्ध भेल। मुनिश्रेष्ठ के ई तपोभूमि आदि काल सॅं माँ सरस्वतीक विशेष अनुकम्पा सॅं अनुग्रहित अछि। एतए के धूलिकण मे आह्लादित लक्ष्मीक स्वरूप स्पष्ट रूप सॅं देखल जा सकैछ। सम्भवतः इएह कारण होएत जे नारायण प्रसन्न भऽ एहि स्थान केॅ बहुसंख्यक ब्राह्मणक जन्मभूमि के रूप मे पुरस्कृत कएलथिन्ह  । करीब 700 परिवार वाला एहि गाम मे सभ केओ एक दोसर के कौलिक, पारिवारिक आ पारम्परिक सामाजिक कार्य मे सहोदरा सम्बन्ध के निर्बहण करैत जनक के समाजवाद केॅ एखनहुं चरितार्थ करैत छथि।

 

पारम्परिक रूप सॅं कृषि प्रधान एहि गाम मे शिक्षाक अलख जगौनिहार प्रथम महापुरुष ज्योतिषी परमेश्वरीदत्त मिश्र भेलाह – जे तत्कालीन श्रीनगर चम्पानगर राज ड्योढ़ी के राज पण्डितक रूप मे सम्मानित छलाह। समकालीन भारतवर्ष के श्रेष्ठतम विद्वानक सूची मे मिथिला सॅं तीन टा विद्वानक नाम अबैत छल। ओ स्वनामधन्य महापुरुष लोकनि छलाह – 1. ठाढ़ी के विश्वनाथ झा 2. नवानी के बच्चा झा 3. तिलाठी के परमेश्वरीदत्त मिश्र।

 

शिक्षा केॅ सर्वसुलभ बनएबाक हेतु ज्यो. परमेश्वरीदत्त मिश्र तिलाठी मे अपन निवास स्थान पर चौपाड़ि के संचालन कएने छलाह जतए नि:शुल्क ज्योतिष शिक्षा प्रदान कयल जाइत छलै। ई ओ समय छल जखन संस्थागत शिक्षा प्रणाली के विकास नहि भेल छलै। गुरु लोकनि द्वारा संचालित इएह चौपाड़ि सभ विश्वविद्यालय समान छलै। गुरु द्वारा कोनो शिष्य के शिक्षा पूर्ण होएबाक घोषणा अन्तिम प्रमाण पत्र होइत छलै। मिथिलांचल के विभिन्न भाग सॅं सैकड़ो छात्र लोकनि एहि चौपाड़ि सॅं गुरु परमेश्वरीदत्त मिश्र द्वारा ज्योतिष शिक्षा केॅ प्राप्त कऽ लब्ध प्रतिष्ठित ज्योतिषी भेलाह। चौपाड़ि के संचालन मे गुरुक अतिरिक्त ग्रामीण के सेहो महत्वपूर्ण योगदान छलै। आन गाम सॅं अध्ययन हेतु आयल छात्र लोकनिक भोजन आ आवास व्यवस्था गामक संपन्न कृषक लोकनि निज- निज आवास पर करैत छलखिन।

 

एहि गाम के ज्यो. भुलर झा, ज्यो. नन्दकिशोर मिश्र, ज्यो. यदुनन्दन मिश्र, ज्यो. कंटीर मिश्र, ज्यो. केदार मिश्र आदि आ अन्य गाम सभ के अनेको हुनकर शिष्य लोकनि ज्योतिष शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान भऽ गुरु के कीर्ति पताका केॅ थामि निज- निज गाम केॅ गौरवान्वित करैत रहलाह। गुरुक अवसानक संगहि चौपाड़ि सेहो अस्तित्वहीन भऽ गेल मुदा ओहि स्थान केॅ एखनहुं चौपाड़ि कहल जाइत छैक। यद्यपि ओ महात्मा सशरीर एहि संसार मे नहि छथि तथापि हुनकर चौपाड़ि, पोखरि, ईनार आदि कीर्ति स्तम्भ नवका पुस्ता केॅ ओहि गौरवशाली महापुरुष के स्मरण करबैत रहैत अछि।

 

ओहि महात्मा के अवसानक पश्चात गाम मे किछु दिन शिक्षा दीप टीमटीमाबए लागल जकरा भक्ष्य दऽ पुन: प्रज्वलित करबाक कार्य कयलन्हि ज्योतिषी यदुनन्दन मिश्र । ओ नेपाल मे राणा दरबार के राज पण्डित छलाह। हुनका द्वारा राणा प्रधानमंत्री चन्द्र शमशेर लग कयल गेल प्रयासक परिणामस्वरूप त्रिचन्द संस्कृत महाविद्यालय तिलाठीक स्थापना भेल। एहि महाविद्यालय मे नियुक्त प्राध्यापक के पारिश्रमिक सुविधा राज्यकोष सॅं उपलब्ध कराओल जाइत छलै। तत्कालीन समय मे नेपाल मे विश्वविद्यालय नहि होएबाक कारण विहार संस्कृत विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के आङ्गिक महाविद्यालय के रूप मे एकर स्थापना भेल छल। एहि विद्यापीठ के स्थापनार्थ ग्रामीण लोकनि सहर्ष भूमि दान कएने छलाह आ विपन्न छात्र लोकनि केॅ भोजन दान करबाक परम्परा अन्त्य धरि निर्बहण करैत रहलाह। छात्रावास, गुरु आवास के व्यवस्था कयल गेल आ ई स्थान तिलाठीक पाठशाला नाम सॅं प्रसिद्ध भऽ माँ सरस्वतीक क्रीड़ा क्षेत्र मे परिणित भऽ गेल।

 

पं. लालजी मिश्र, पं. दामोदर झा, पं. काशीनाथ ठाकुर सनके अद्वितीय गुरुश्रेष्ठ सभके अध्यापन, नियन्त्रण आ रेखदेख मे नेपाल आ भारत के मिथिला क्षेत्रीय सैकड़ों छात्र लोकनि एतए सॅं व्याकरण, साहित्य, न्याय मिमांसा आदि विषय के आचार्य भेलाह। सरस्वती पुत्र सभ के कठोर तप सॅं पवित्र भेल ई भूमि कोनो सिद्ध देवस्थल सॅं कम महत्व नहि रखैत अछि। एखनहुं अनुभूति होइत अछि जेना एहि भूमि के कण कण सॅं वेद ध्वनि गुञ्जायमान होइत हो।

 

तिलाठी के प्रसिद्ध वार्षिक सरस्वती पूजा के आयोजन सर्वप्रथम अहि महाविद्यालय के गुरु आ छात्र सभके द्वारा भेल छल जे कालांतर मे ग्रामीण के सहयोग आ सहभागिता सॅं ग्रामीण पूजा मे परिणित भऽ गेल। सरस्वती पूजा केॅ उत्सव मे परिणत करबाक हेतु तत्कालीन छात्र लोकनि द्वारा पूजा अनुष्ठान मे सक्रिय सहभागिताक सॅंग नाट्य परम्परा के आरम्भ कयल गेल, जे एखनहुं एहि अवसर के मुख्य आकर्षण बनल अछि। ब्राह्म मुहुर्त मे वेद ध्वनि आ भगवतीक स्तुति सॅं शुरू भऽ प्रातःकाल पूजन, सप्तशती पाठ, तत्पश्चात विशिष्ट गायक सभ के द्वारा सांगितिक कार्यक्रम के प्रस्तुति, एकर बाद फैलका पर दंगल, दंगलक समाप्तिक सॅंग नौटंकी आरम्भ, रात्रि के 10 बजे धरि नौटंकी समाप्त आ नाटक प्रारम्भ होइत छल जे ब्राह्म मुहुर्त धरि चलैत छलै। अर्थात अहर्निश माँ सरस्वती के पूजा आराधना केॅ उत्सव मे परिणत करबाक हेतु किछु ने किछु कार्यक्रम अनवरत रूप सॅं आयोजन करबाक परम्परा कमोबेश एखनहुं अक्षुण्ण अछि। बसन्त पञ्चमीक अवसर पर माँ सरस्वती के सार्वजनिक पूजन आ भब्य पूजनोत्सव करीब सबा सौ वर्ष सॅं आयोजित होइत आबि रहल अछि। एहि समयान्तराल मे गामक विभिन्न पीढ़ी के सक्रिय सहभागिता, अनन्य विश्वास एवं प्रगाढ़ श्रद्धा एहि पूजनोत्सव केॅ सप्ताहब्यापी ग्रामीण महोत्सव मे परिणित कऽ देलक अछि।

 

20 वीं सदी के आरम्भ मे स्थापित संस्कृत पाठशाला जतए संस्कृत शिक्षा सॅं गाम केॅ पल्लवित पुष्पित करए लागल ओतए किछु सम्पन्न परिवारक बालक लोकनि बाहर जा आधुनिक शिक्षा केॅ सेहो प्राप्त करए लगलाह। परिणामस्वरूप प्राचीन शिक्षा के आचार्य आ आधुनिक शिक्षा के स्नातक लोकनि डाक्टर, इन्जीनियर, न्यायाधीश, वकील, प्राध्यापक, शिक्षक आदि बनि उच्च राजकीय पद सभ पर सुशोभित भऽ गाम केॅ गौरवान्वित करए लगलाह। किन्तु, भारत मे स्वतंत्रता प्राप्ति आ नेपाल मे राणा शासन के अन्त सॅंगहि भेल राजनैतिक आ कानूनी व्यवस्था मे परिवर्तन के कारण त्रिचन्द संस्कृत महाविद्यालय के विघटन भऽ गेल। तत्कालीन समय मे आधुनिक शिक्षा जे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहि छलै, सर्वसाधारण के लेल सुलभ नहि छलै।

 

एहेन विकट परिस्थिति मे कुणौली के पुण्यात्मा जागेश्वर राम एहि क्षेत्र मे शिक्षा के विकास हेतु माध्यमिक विद्यालय स्थापना करबाक विचार प्रकट कयलन्हि। क्षेत्रक सभ गामके प्रमुख लोक सभके बैसार भेल। एहि पुनीत कार्य मे तिलाठी बढ़िचढ़ि केॅ हिस्सा लेलक आ तन मन सॅं सहयोग करबाक निर्णय भेल। परिणामस्वरूप सन् 1953 ई. मे जागेश्वर उच्च विद्यालय कुणौली के स्थापना भेल जकर प्रथम शिक्षक के रूप मे तिलाठी के संस्कृत व्याकरण, साहित्य आ कर्मकांड के प्रकांड विद्वान पण्डित विक्रम झा नियुक्त भेलाह। एहि क्षेत्र के सर्वसाधारण मे शिक्षा प्रति अभिरुचि जगएबामे हुनकर योगदान सदैव अविस्मरणीय रहत। ओ गामक लेल एकटा युगांतरकारी पुरुष भेलाह। संस्कृत के विशिष्ट विद्वान सॅं समृद्ध गामक ऐतिहासिक परम्परा ज्यो. परमेश्वरीदत्त मिश्र सॅं शुरू भऽ करीब 200 वर्ष पश्चात पं. विक्रम झा के देहावसानक संगहि रिक्तता केॅ प्राप्त कऽ चुकल अछि।

 

गामक सर्वसाधारण केॅ कुणौली हाई स्कूल मे शिक्षा प्राप्त करब सुलभ भऽ गेल। माध्यमिक शिक्षा पश्चात छात्र लोकनि भारत आ नेपाल के विभिन्न स्थान सॅं उच्च शिक्षा प्राप्त करए लगलाह। सन् 1963 ई. मे एहि गाम के विकास पुरुष यमुनानन्द मिश्र के सक्रिय प्रयासक परिणामस्वरूप गामहि मे कन्या प्राथमिक विद्यालय आ माध्यमिक विद्यालय के स्थापना भेल। गाम मे शैक्षणिक गतिविधि उत्कर्ष पर पहंचए लागल। परिणामस्वरूप सन् 1966 ई. मे नेपाल के तात्कालिक संवैधानिक व्यवस्था अनुसार ग्राइजुएट हाउस के चुनाव के समय मे कयल गेल सर्वेक्षण अनुसार नेपाल अधिराज्य भरि मे सब सॅं बेसी ग्राइजुएट वाला गाम इएह तिलाठी छल। वर्तमान समय मे आओर बेसी शैक्षिक प्रगति देखल जाइत अछि, सैकड़ो के संख्या मे इन्जीनियर, डाक्टर, पायलट, प्राध्यापक, शिक्षक, बैंकर, वकील, प्रशासनिक अधिकारी आ अन्य पेशाकर्मी एतए के धरोहर छथि ।

 

गामक अधिकांश सरस्वती पुत्र के कर्मभूमि गाम सॅं बाहर अछि। नेपाल के सब जिला आ प्रमुख शहर मे एहि गाम के केओ ने केओ निश्चित रूप सॅं भेट जेताह। भूमंडलीकरण के एहि युग मे भारतक अतिरिक्त विश्व के अन्यान्य देश सभके सेहो एहि गाम के अनेकों सन्तान लोकनि अपन कर्मभूमि बनाओने छथि। 80 के दशक सॅं करीब 35 वर्ष धरि खाॅंड़ो नदी के अनियन्त्रित बहाव सॅं ई गाम अत्यधिक प्रभावित भेल। खास कऽ केॅ कृषि पर निर्भर लोक सभक हाल बेहाल भऽ गेल। दु दु टा बखारी वाला कृषक केॅ नवान्न कठिन भऽ गेल रहै। अत्यंत विषम परिस्थिति मे बहुत लोक केॅ शहरमुखी होमए पड़ल । ओहि समय के विकट परिस्थितिक वर्णन ताहि समय मे रचित एक पद्यक माध्यम सॅं-

 

ब्रह्म ग्राम गुण  ग्राम तिलाठी,

सज्जन जन बसथि पुरबासी।

तीन नदी  त्रिपेक्षण  करइत,

शोभा शील जेहेन छल काशी।।

बेद बदन  कर  पुस्तक  शोभा,

बिप्र बसथि एहि नगर अशोका।

कृषि कर्म ओ’   गो-कुल  सेवा,

बृत्ति अन्य अपि  तृप्त  पुरोधा।।

पग-पग  पोखरि   आम बगान,

अरडनेवा जामुन लीची लताम।

सु-सुमन सुसज्जित  गृह दलान,

स्मृति सुखद जेना नन्दन  उद्यान।।

मटियारि भूमि पर  पाँक’ क लेप,

खलखल हँसइत छल धान’क खेत।

कलुषित  नजर  केकर  पडि  गेल,

पोखरि भीठ  खेत खत्ता  बनि गेल।।

उजडल  उपवन  उपटल   गाम,

रिक्त बखारी  बडद बिहीन बथान।

खदखद  चाली   सहसह  साँप,

बेंग’क  टरटर   गाम  आक्रान्त ।।

क्षुद्र  नदी  एक  खाँडो   हीन,

प्रलय प्रकोप सँ बनयलक दीन।

पञ्चोत्तर  दशक  भेल  तीन,

बनल तिलाठी बर्षा काल’क मीन ।।

स्वार्थी समाज  के खींचातानी,

निर्लज्ज  राज्य के  आनाकानी।

राज्य  कोष  मे  कर  के  दानी,

अनुगृहित पाबि नून चूडा ओ पानी।।

हमर  मत  सँ   बनल  सरकार,

हमरहिँ  बनाओने  अछि  लाचार।

धिक् धिक्  नव  महाराज   धिक्कार,

कहिया सुनब कुमुद के करूण चीत्कार ?

 

बिलम्बहिं सही किन्तु करुण चीत्कार केॅ सुनल गेल, आब खाॅंड़ो नदी के नियन्त्रण भऽ गेल अछि। गाम पुनः अपन स्वरूप मे आओरो विकसित रूप सॅं आबि गेल अछि , तथापि गाम के अमूल्य निधि केॅ स्थायी रूप सॅं एहि भूमि पर स्थापित करनाई एखनहु चुनौति के विषय बनल अछि  ।

 

 

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